पत्रकारिता और मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई करने वाले युवाओं के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या केवल डिग्री हासिल कर लेना उन्हें एक संवेदनशील और पेशेवर मीडियाकर्मी बना सकता है। सोशल मीडिया पर वायरल एक तस्वीर ने इसी बहस को फिर तेज कर दिया है। तस्वीर में एक राष्ट्रीय टीवी (TV) चैनल की महिला ऐंकर पानी से भरे इलाके में कमर तक उतरकर रिपोर्टिंग करती दिखाई दे रही हैं। हाथ में माइक और कमर में सेफ्टी बेल्ट बांधे यह दृश्य अब पत्रकारिता की दिशा और उसकी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
Tv मीडिया जगत से जुड़े कई लोगों का मानना है कि आज न्यूजरूम में खबरों से ज्यादा “दृश्य” और “ड्रामा” को महत्व दिया जा रहा है। टीआरपी की दौड़ में पत्रकारिता का मूल उद्देश्य — समाज को तथ्यपरक, संवेदनशील और जिम्मेदार सूचना देना — लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। tv ANCHOR अब्राहम मिराज का कहना है कि चैनलों में काम करने वाले युवा पत्रकारों पर ऐसी प्रस्तुति थोप दी जाती है जिसमें संवेदनशीलता से अधिक सनसनी को प्राथमिकता मिलती है।
वरिष्ठ मीडिया विश्लेषकों के अनुसार, यह केवल एक तस्वीर का मामला नहीं बल्कि TV मीडिया संस्कृति में आए बड़े बदलाव का संकेत है। उनका कहना है कि कई न्यूजरूम अब विचार, तथ्य और जनसरोकार से ज्यादा “परफॉर्मेंस” आधारित मॉडल पर काम कर रहे हैं। इससे पत्रकारों के भीतर स्वतंत्र सोच और सामाजिक जिम्मेदारी का दायरा सीमित होता जा रहा है। ऐसे दौर में एक ऐसे संपादक को जानिये जिसने घर नहीं बनाया बल्कि अखबार बनाया, यहाँ क्लिक करें।
News DON युवा छात्रों और पत्रकारिता में करियर बनाने वालों से अपील करता है है कि वे इस पेशे (TV Journalism) को केवल ग्लैमर या टीवी स्क्रीन तक सीमित न समझें। पत्रकारिता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है, जहां संवेदनशीलता, विवेक और मानवीय दृष्टि सबसे बड़ी योग्यता मानी जाती है। ऐसे में अंतिम फैसला लेने से पहले यह समझना जरूरी है कि पत्रकारिता केवल नौकरी नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

































