लखनऊ /नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश के एक कथित टिप्पणी से सोशल मीडिया पर उभरी कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक दिवसीय आंदोलन ने अचानक देश की राजनीतिक और मीडिया बहस में अपनी जगह बना ली है। युवाओं की भीड़, सोशल मीडिया पर वायरल होती तस्वीरें और पारंपरिक राजनीति के खिलाफ आक्रोश—इन सबने इसे एक नए राजनीतिक प्रयोग की शक्ल दे दी है। लेकिन इसके साथ ही कई गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक और सत्य हिन्दी के सह संस्थापक शीतल पी सिंह का मानना है कि यदि इस पूरे घटनाक्रम को सत्ता के नजरिये से देखा जाए तो यह विपक्ष को कमजोर करने की रणनीति जैसा दिखाई देता है। उनका संकेत इस ओर है कि भारतीय राजनीति में अक्सर नए वैकल्पिक आंदोलनों का इस्तेमाल विपक्षी वोट और जनभावनाओं को विभाजित करने के लिए किया जाता रहा है। वे कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए मुफ़ीद मान रहे हैं।
वहीं पत्रकार और महिला सरोकारों के लिए जानी जाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता शीबा असलम फहमी कॉकरोच जनता पार्टी की पूरी परिघटना और दिल्ली में जमावड़े को और भी संदेह की दृष्टि से देखती हैं। उनके अनुसार यह पूरा जमावड़ा एक “रिचुअल” जैसा प्रतीत होता है, जिसे अप्रत्यक्ष राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। दूसरी ओर वरिष्ठ पत्रकार और Zee News के पूर्व संपादक सतीश के सिंह जनता के दृष्टिकोण को केंद्र में रखते हैं। उनका कहना है कि भारतीय जनता बार-बार राजनीतिक वादों से ठगी गई है, इसलिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह आंदोलन युवाओं और आम लोगों के वास्तविक मुद्दों को ईमानदारी से उठाता है या नहीं।

हालांकि जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष अदिति मिश्रा इसे युवाओं की बेचैनी और आकांक्षाओं का आंदोलन मानती हैं। उनका तर्क है कि जब युवा सड़क पर उतर रहे हैं तो लोकतांत्रिक शक्तियों को उनका समर्थन करना चाहिए।
इसी बहस के बीच बीबीसी हिन्दी की सर्वप्रिया सांगवान किसी भी तरह की “कांस्पिरेसी थ्योरी” को खारिज करती नजर आती हैं। उनका मानना है कि हर नए जनआंदोलन को सत्ता प्रायोजित बताकर खारिज कर देना लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है। उनके अनुसार युवाओं के भीतर बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और राजनीतिक निराशा को लेकर जो असंतोष है, वही इस आंदोलन की वास्तविक जमीन है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल पुलिस और प्रशासन के व्यवहार को लेकर उठ रहा है। वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव का कहना है कि जहां NEET पेपर लीक और युवाओं के मुद्दों पर कांग्रेस के प्रदर्शनों पर लाठीचार्ज किया गया और वाटर कैनन चलाए गए, वहीं CJP को कथित “वीआईपी ट्रीटमेंट” मिलना स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करता है।
दरअसल, भारतीय लोकतंत्र में किसी भी नए आंदोलन का स्वागत होना चाहिए, लेकिन उसकी विश्वसनीयता का पैमाना सत्ता से उसकी दूरी और जनता के मुद्दों पर उसकी प्रतिबद्धता ही होगी। आने वाले समय में तय होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी वास्तव में व्यवस्था-विरोधी जनआंदोलन है या फिर भारतीय राजनीति का एक नया प्रयोग।


































