लखनऊ (संपादकीय डेस्क) । लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि उसमें किसी भी संस्था, व्यक्ति या व्यवस्था को जवाबदेही से ऊपर नहीं माना जाता। चाहे मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े किसी धार्मिक ट्रस्ट का हो या फिर किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री और उनके परिवार से जुड़े भूमि सौदों का, जनता का पहला और सबसे महत्वपूर्ण अधिकार पारदर्शिता की मांग करना है। हाल के दिनों में अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े विवाद और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार की भूमि खरीद संबंधी आरोप श्रद्धा और सत्ता के इसी व्यापक प्रश्न को सामने लाते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अयोध्या दौरे से पहले चंपत राय को लेकर रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
अयोध्या राम मंदिर देश के करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र है। यहां आने वाला दान केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि भक्तों के विश्वास का प्रतीक है। ऐसे में यदि नकद, सोना-चांदी और आभूषणों के प्रबंधन में अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से समाज में चिंता पैदा होती है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय एसआईटी की प्रारंभिक जांच में बड़े पैमाने पर घोटाले के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं, लेकिन कई गंभीर प्रक्रियागत कमियां सामने आई हैं। सीसीटीवी फुटेज का केवल 45 दिनों तक सुरक्षित रहना, कैश काउंटिंग व्यवस्था की कमजोरियां, कर्मचारियों का पर्याप्त सत्यापन न होना तथा निगरानी तंत्र में खामियां इस बात का संकेत हैं कि संस्थागत सुधार की आवश्यकता है।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि अब तक ₹200 करोड़ की कथित चोरी जैसे दावों की पुष्टि नहीं हुई है। फिर भी यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि घोटाला सिद्ध नहीं हुआ, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। सार्वजनिक विश्वास केवल अपराध सिद्ध होने या न होने से नहीं बनता, बल्कि ऐसी व्यवस्थाओं से बनता है जिनमें गड़बड़ी की संभावना न्यूनतम हो। धार्मिक ट्रस्टों, विशेषकर उन संस्थाओं में जिनके पास विशाल जन-दान आता है, पारदर्शी ऑडिट, आधुनिक निगरानी तंत्र और स्वतंत्र समीक्षा श्रद्धा और सत्ता की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य होनी चाहिए।
दूसरी ओर, मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और उनसे जुड़ी कंपनियों द्वारा उज्जैन क्षेत्र में बड़ी मात्रा में भूमि खरीद के आरोप भी सुशासन की कसौटी पर परखे जाने चाहिए। आरोप यह है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके परिवार ने उन क्षेत्रों में जमीन खरीदी, जो भविष्य के सड़क, बाईपास और मास्टर प्लान विकास क्षेत्रों के निकट हैं। परिवार का कहना है कि वह वर्षों से रियल एस्टेट व्यवसाय में है और सभी खरीद-फरोख्त विधिसम्मत तथा घोषित हैं।

यहां मूल प्रश्न केवल वैधानिकता का नहीं, बल्कि ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ अर्थात हितों के टकराव का है। लोकतांत्रिक शासन में यह अपेक्षा की जाती है कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति और उनके निकट संबंधियों की आर्थिक गतिविधियां ऐसी न हों, जिनसे सरकारी निर्णयों के निष्पक्ष होने पर संदेह पैदा हो। भले ही किसी अदालत या जांच एजेंसी ने अभी तक कोई अनियमितता सिद्ध न की हो, लेकिन पारदर्शिता के उच्च मानक यही मांग करते हैं कि श्रद्धा और सत्ता के ऐसे मामलों में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो तथा जनता को तथ्यों से अवगत कराया जाए। इन दोनों मामलों को सांप्रदायिक या राजनीतिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति भी चिंता का विषय है। राम मंदिर का मुद्दा केवल किसी एक समुदाय का आंतरिक मामला नहीं है, क्योंकि यह सार्वजनिक दान और ट्रस्ट प्रबंधन से जुड़ा प्रश्न है। इसी प्रकार भूमि खरीद का मामला किसी एक दल विशेष तक सीमित नहीं है। यदि किसी भी सरकार, किसी भी मुख्यमंत्री या किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े व्यक्ति पर हितों के टकराव का आरोप लगता है, तो वही नैतिक और प्रशासनिक मानक लागू होने चाहिए।
इसी संदर्भ में देश की राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण पर भी ध्यान देना आवश्यक है। विभिन्न चुनावी अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि एक ओर हिंदू मतदाताओं का बड़ा वर्ग भाजपा के पक्ष में संगठित हुआ है, वहीं मुस्लिम मतदाता बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के समर्थन में एकजुट दिखाई देते हैं। भाजपा ने पसमांदा मुसलमानों तक पहुंच बनाने, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने और सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के प्रयास किए हैं। इन योजनाओं से वास्तविक लाभ भी अनेक परिवारों तक पहुंचा है। लेकिन यह भी सत्य है कि विकास और कल्याण की राजनीति, जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता का विकल्प नहीं बन सकती।

लोकतंत्र में सुशासन का अर्थ केवल योजनाएं लागू करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि सार्वजनिक धन, सार्वजनिक संस्थाएं और सार्वजनिक शक्ति पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ संचालित हों। श्रद्धा और विश्वास सत्ता दोनों की विश्वसनीयता का आधार जवाबदेही ही है। इसलिए राम मंदिर ट्रस्ट में सुधार की मांग हो या भूमि खरीद मामलों में स्वतंत्र जांच की मांग, इन्हें राजनीतिक या सांप्रदायिक खांचों में बांटने के बजाय लोकतांत्रिक जवाबदेही के सामान्य सिद्धांत के रूप में देखा जाना चाहिए। अंततः किसी भी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे लोकप्रिय नेताओं और सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं से भी कठिन प्रश्न पूछने का साहस रखता है। पारदर्शिता किसी संस्था को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे अधिक विश्वसनीय और मजबूत बनाती है। For more updates follow on X



































