लखनऊ (संपादकीय डेस्क) । भारत को दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में गिना जाता है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) देश की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है, लेकिन हाल की घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या हम अपने युवाओं को अवसर दे रहे हैं या उन्हें एक ऐसे तंत्र में धकेल रहे हैं जो निराशा, असुरक्षा और मानसिक दबाव को जन्म देता है। NEET 2026 पेपर लीक ने इसी गहरे शिक्षा संकट को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG परीक्षा में लगभग 22.8 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया था लेकिन 12 मई को पेपर लीक और कथित “गेस पेपर” के व्यापक प्रसार के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई। जांच एजेंसियों के अनुसार वायरल सामग्री में रसायन विज्ञान के लगभग 45 और जीव विज्ञान के लगभग 90 प्रश्न वास्तविक परीक्षा से मेल खाते पाए गए। CBI और राजस्थान एसओजी की जांच में कई राज्यों तक फैले नेटवर्क का खुलासा हुआ और अनेक गिरफ्तारियां हुईं। इस घटना ने केवल परीक्षा की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न नहीं लगाया, बल्कि लाखों छात्रों के एक वर्ष के परिश्रम को भी अनिश्चितता के गर्त में धकेल दिया।
NEET 2026 पेपर लीक के संकट का सबसे दुखद पहलू छात्रों पर पड़ने वाला मानसिक प्रभाव है। राजस्थान के कोटा सहित देश के विभिन्न हिस्सों से परीक्षा रद्द होने के बाद छात्र आत्महत्याओं की खबरें सामने आईं। पिछले एक दशक में केवल कोटा में ही 127 से अधिक छात्र आत्महत्याएं दर्ज की जा चुकी हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार 2021 में 12,526 छात्रों ने आत्महत्या की थी, जो कुल आत्महत्याओं का लगभग 8.5 प्रतिशत था। यह आंकड़ा बताता है कि शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव केवल शैक्षणिक समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य संकट भी बन चुका है।
इस स्थिति के पीछे केवल परीक्षा प्रणाली की खामियां नहीं हैं, बल्कि शिक्षा का व्यापक ढांचा भी जिम्मेदार है। भारत अपनी जीडीपी का लगभग 4 से 5 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है, जबकि दूसरी ओर निजी कोचिंग उद्योग हजारों करोड़ रुपये का कारोबार कर रहा है। केवल कोटा का कोचिंग बाजार ही लगभग 6,000 करोड़ रुपये वार्षिक का माना जाता है। लाखों परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर खर्च करते हैं। यह स्थिति संकेत देती है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था और प्रवेश परीक्षाओं पर भरोसा कमजोर हुआ है तथा सफलता का रास्ता धीरे-धीरे महंगी कोचिंग संस्थाओं से होकर गुजरने लगा है। समस्या का दूसरा आयाम रोजगार है। युवा बेरोजगारी दर लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार स्नातक युवाओं में बेरोजगारी 35 से 40 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। हर वर्ष लाखों विद्यार्थी डिग्रियां लेकर निकलते हैं, लेकिन उनके अनुरूप रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप प्रतियोगी परीक्षाएं जीवन-मरण का प्रश्न बन जाती हैं। सीमित सीटें, सीमित अवसर और बढ़ती प्रतिस्पर्धा छात्रों पर असाधारण दबाव डालती है।क्या भारत बूढ़ा हो रहा है, ये संपादकीय पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कोटा से “छात्रों की गूंज” अभियान की शुरुआत की है। उनका दावा है कि यह राजनीतिक रैली नहीं, बल्कि छात्रों के मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का प्रयास है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी इसे शिक्षा के मुद्दों का राजनीतिकरण बताती है। लोकतंत्र में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हो सकती हैं, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या 22 लाख से अधिक छात्रों को प्रभावित करने वाला परीक्षा संकट केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय रह सकता है?

सरकार का पक्ष भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले वर्षों में परीक्षा सुरक्षा, डिजिटल मूल्यांकन और कंप्यूटर आधारित परीक्षण (CBT) की दिशा में सुधारों की बात की गई है। यदि इन सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो भविष्य में NEET 2026 पेपर लीक पेपर लीक जैसी घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। लेकिन केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे। NTA की जवाबदेही, परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता, मेडिकल और उच्च शिक्षा में सीटों की वृद्धि तथा छात्रों के लिए मजबूत मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली जैसे ठोस कदम उठाने होंगे।

भारत का शिक्षा संकट किसी एक दल, सरकार या संगठन का मुद्दा नहीं है। यह करोड़ों युवाओं के भविष्य और देश की विकास यात्रा से जुड़ा प्रश्न है। NEET 2026 पेपर लीक ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि यदि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगार के अवसरों के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो देश का जनसांख्यिकीय लाभांश बोझ में बदल सकता है। इसलिए समय की मांग है कि राजनीति से ऊपर उठकर शिक्षा और युवाओं को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के सपनों पर टिका होता है, और उन सपनों की रक्षा करना सरकार, समाज और राजनीतिक दलों सभी की साझा जिम्मेदारी है। For more updates follow on X
































