West Asia में खून खराबा बंद करा पायेगे President Trump?

प्रेसिडेंट ट्रंप की डीलमेकिंग ने West Asia में फिलहाल तनाव कम करने और संवाद की संभावना को जीवित रखने का काम किया है। यह एक सकारात्मक शुरुआत है, लेकिन इसे अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। मध्य-पूर्व का इतिहास बताता है कि कागज पर हुए समझौते तभी टिकते हैं

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Map of West Asia
Map of West Asia

लखनऊ (संपादकीय डेस्क)। पश्चिम एशिया (West Asia) एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। पिछले कुछ महीनों से जारी ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच तनाव ने दुनिया को एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की आशंका में डाल दिया था। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी विशिष्ट “डीलमेकिंग” शैली के तहत ईरान के साथ समझौते की घोषणा की, जिसके परिणामस्वरूप युद्धविराम की दिशा में प्रगति हुई और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को राहत मिली। अमेरिका द्वारा नौसैनिक नाकेबंदी हटाने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य को पुनः खोलने की सहमति ने विश्व अर्थव्यवस्था में स्थिरता की उम्मीद जगाई है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में स्थायी शांति की शुरुआत है या केवल एक अस्थायी विराम?

प्रेसिडेंट ट्रंप की विदेश नीति का मूल मंत्र “America First” रहा है। उनकी रणनीति पारंपरिक कूटनीति की बजाय सौदेबाजी, दबाव और त्वरित समझौतों पर आधारित दिखाई देती है। ईरान के साथ हुआ हालिया समझौता भी इसी दृष्टिकोण का उदाहरण है। हालांकि इस पहल ने तत्काल तनाव कम करने में भूमिका निभाई, लेकिन इसके सामने कई गंभीर चुनौतियाँ मौजूद हैं। सबसे बड़ी चुनौती इज़राइल की सुरक्षा चिंताएँ और क्षेत्र में सक्रिय ईरान समर्थित समूह हैं। हाल के दिनों में कई बार युद्धविराम टूटने की स्थिति बनी और स्वयं ट्रंप को दोनों पक्षों से “फायरिंग रोकने” की अपील करनी पड़ी।

वास्तविक समस्या यह है कि समझौते के कई महत्वपूर्ण बिंदु अभी अस्पष्ट हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मूल प्रश्नों को भविष्य की वार्ताओं के लिए छोड़ दिया गया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि West Asia स्थायी शांति के रास्ते पर चल पड़ा है। फिलहाल यह एक नाजुक युद्धविराम है, जिसकी सफलता संबंधित पक्षों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगी। भारत के दृष्टिकोण से यह घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से प्राप्त करता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव कम होने से तेल आपूर्ति सुचारु रहने और कीमतों पर दबाव घटने की संभावना है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। साथ ही भारत के सामने एक जटिल कूटनीतिक संतुलन भी है। उसके अमेरिका, इज़राइल, ईरान और अरब देशों—सभी के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। ऐसे में भारत को किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय अपनी “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति को और मजबूत करना होगा। कैसे एक छोटी सी कम्युनिटी ने दुनिया को क़ब्ज़े में कर रखा है! पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

पिछले दशक में भारत ने यही संतुलन सफलतापूर्वक बनाए रखा है। एक ओर वह अमेरिका के साथ इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और संपर्क परियोजनाओं को महत्व देता है तथा इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग को भी आगे बढ़ाता है। West Asia का वर्तमान संकट भारत के लिए यह याद दिलाता है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में रणनीतिक स्वायत्तता ही सबसे सुरक्षित विकल्प है। इस पूरे घटनाक्रम का एक मानवीय पक्ष भी है, जिसे अक्सर भू-राजनीतिक बहसों में भुला दिया जाता है। युद्ध चाहे किसी भी पक्ष के बीच हो, उसकी सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक चुकाते हैं। हजारों परिवार विस्थापित होते हैं, अर्थव्यवस्थाएँ प्रभावित होती हैं और क्षेत्रीय अस्थिरता का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। इसलिए किसी भी शांति प्रयास का मूल्यांकन केवल राजनीतिक लाभ या कूटनीतिक सफलता से नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

US President Trump with his colleagues on west Asis conflict
President Trump with his colleagues on west Asis conflict

प्रेसिडेंट ट्रंप की डीलमेकिंग ने West Asia में फिलहाल तनाव कम करने और संवाद की संभावना को जीवित रखने का काम किया है। यह एक सकारात्मक शुरुआत है, लेकिन इसे अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। मध्य-पूर्व का इतिहास बताता है कि कागज पर हुए समझौते तभी टिकते हैं जब क्षेत्रीय शक्तियाँ उन्हें ईमानदारी से लागू करें। फिलहाल उम्मीद की किरण जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन शांति का रास्ता अभी भी लंबा और चुनौतीपूर्ण है। इसलिए इस समझौते को स्थायी शांति नहीं, बल्कि शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण लेकिन नाजुक कदम के रूप में देखना अधिक उचित होगा। For more updates follow on X

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