नए संसद भवन पर सियासत: Symbolism or Celebration?

लोकतंत्र की मजबूती भवनों के उद्घाटन से नहीं, बल्कि उन भवनों के भीतर होने वाली सार्थक बहस, जवाबदेही और जनहित के निर्णयों से तय होती है। नए संसद भवन को राजनीतिक विवाद का विषय बनाने के बजाय भारतीय लोकतंत्र की उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए।

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लखनऊ (संपादकीय डेस्क) । भारत के नए संसद भवन के उद्घाटन को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर प्रतीकों और परंपराओं के इर्द-गिर्द घूमती नजर आई। प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा नए संसद भवन के उद्घाटन के निर्णय का कई विपक्षी दलों ने विरोध किया और तर्क दिया कि उद्घाटन राष्ट्रपति द्वारा किया जाना चाहिए था। इस मुद्दे को लेकर विपक्ष ने इसे संवैधानिक मर्यादाओं और लोकतांत्रिक परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि, इस विरोध के बीच भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने राजनीतिक तरकश से एक महत्वपूर्ण तीर निकाला है।

भाजपा ने छत्तीसगढ़ के नए विधानसभा भवन के भूमि पूजन से जुड़ी तस्वीरें सार्वजनिक कीं, जिनमें तत्कालीन यूपीए अध्यक्ष Sonia Gandhi और सांसद Rahul Gandhi भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल दिखाई देते हैं। भाजपा का तर्क है कि यदि उस समय किसी संवैधानिक पदाधिकारी के बजाय राजनीतिक नेतृत्व की उपस्थिति पर कोई सवाल नहीं उठाया गया, तो संसद भवन के उद्घाटन को लेकर आज विरोध का औचित्य क्या है?

दरअसल, यह पूरा विवाद केवल भवन के उद्घाटन तक सीमित नहीं है। इसके पीछे राजनीतिक संदेश और जनमत को प्रभावित करने की कोशिश भी दिखाई देती है। संसद और विधानसभा जैसे भवन केवल ईंट-पत्थर की संरचनाएं नहीं होते, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतीक होते हैं। ऐसे में इनसे जुड़े आयोजनों को लेकर राजनीतिक दल अपनी-अपनी व्याख्याएं प्रस्तुत करते हैं।
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं को पूरी तरह राजनीतिक चश्मे से देखना भी उचित नहीं माना जा सकता। नया संसद भवन देश की बढ़ती आवश्यकताओं, आधुनिक तकनीक और भविष्य की लोकतांत्रिक जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यह भवन किसी एक दल या सरकार का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का है।

Prime Minister Narendra Modi
पीएम नरेंद्र मोदी

विपक्ष का यह अधिकार है कि वह सरकार के निर्णयों पर प्रश्न उठाए, लेकिन उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अतीत में अपनाए गए मानकों और वर्तमान में व्यक्त की जा रही आपत्तियों के बीच संतुलन बना रहे। वहीं सत्ता पक्ष को भी राजनीतिक प्रतिवाद के बजाय संवाद और सहमति की संस्कृति को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए। अंततः लोकतंत्र की मजबूती भवनों के उद्घाटन से नहीं, बल्कि उन भवनों के भीतर होने वाली सार्थक बहस, जवाबदेही और जनहित के निर्णयों से तय होती है। नए संसद भवन को राजनीतिक विवाद का विषय बनाने के बजाय भारतीय लोकतंत्र की उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए। For more updates follow on X

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