चौकीदार चोर तो फिर वर्दी वाला, ऐप्रन वाला, क़लम वाला?

राजनैतिक दलों ने लोकसभा चुनाव 2019 अभियान को पॉज़िटिवीटी के बजाय निगेटिवीटी पर केंद्रित कर दिया है ये सूरते हाल जनता के लिए बहुत हानिकारक है।

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लखनऊ (संपादकीय डेस्क)। लोकसभा चुनाव 2019 में देश की राजनीति विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे मूल मुद्दों से भटकती हुई दिखाई दी। चुनावी बहस का केंद्र चौकीदार चोर जैसे नारों और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो गया है। जनता के सामने असली समस्याएँ—बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, महंगाई और शिक्षा व्यवस्था—पिछड़ती चली गईं। राजनीतिक दलों ने भावनाओं, धर्म, जाति और राष्ट्रवाद को हथियार बनाकर जनता को प्रभावित करने की कोशिश की।

आज हालात ऐसे प्रतीत होते हैं कि व्यवस्था के हर स्तंभ पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि डॉक्टर मरीज को सेवा नहीं बल्कि कमाई का साधन समझे, पुलिस पैसे वालों की पक्षधर बन जाए, न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगें और समाज में नैतिकता कमजोर पड़ जाए, तो जनता का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है। ऐसे माहौल में “क्यों गली-गली में शोर है, सिर्फ चौकीदार चोर है जैसे नारे राजनीति का मुख्य विषय बन गए।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अधिकांश राजनीतिक दल जनता को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उन्हें योजनाओं और वादों का “लॉलीपॉप” देकर अपने ऊपर निर्भर बनाए रखना चाहते हैं। लोकतंत्र का उद्देश्य जागरूक और सशक्त नागरिक बनाना होना चाहिए, न कि चौकीदार चोर जैसे नारों के सहारे सत्ता प्राप्त करना। देशहित तभी संभव है जब राजनीति मुद्दों और नैतिक मूल्यों पर आधारित हो।

मतदान का निशान

चौकीदार चोर है जैसे नारों ने 2019 की राजनीति को खूब गर्माया, लेकिन लोकतंत्र केवल आरोपों और नारों से नहीं चलता। जनता अब सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि विकल्प भी मांगती है। यदि कोई दल सत्ता पक्ष पर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी या जनविरोधी नीतियों का आरोप लगाता है, तो उसे यह भरोसा भी देना होगा कि वह स्वयं ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही पर कितना खरा उतरता है।

देश की जनता जातिवाद, परिवारवाद और “फूट डालो, राज करो” की राजनीति से आगे बढ़कर विकास, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय एकता पर ठोस नीति देखना चाहती है। केवल चौकीदार चोर कह भर देने से जनता प्रभावित नहीं होगी, बल्कि वह यह भी देखेगी कि आरोप लगाने वालों का अपना दामन कितना साफ है। लोकतंत्र में विश्वास तभी मजबूत होगा, जब राजनीतिक दल व्यक्तिगत हमलों के बजाय देशहित की स्पष्ट योजनाएं और सकारात्मक विजन जनता के सामने रखें। For more updates follow on X 

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