अब्राहम मिएराज
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार सबसे ज्यादा जिस बात को लेकर चर्चा हो रही है वो है मुस्लिम वोट,यूपी में मुस्लिम मतदाताओं की तादाद लगभग 20 फीसदी के आस-पास है और इस लिहाज से इनका किसी एक पार्टी की ओर जाना पूरे समीकरण को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है।
एसपी-कांग्रेस गठबंधन से लेकर बीएसपी तक सबकी नजर इन्हीं वोटरों पर है. इसमें हैदराबाद के सांसद असद्दुद्दीन ओवैसी से लेकर बरेलवी तौकीर रज़ा तक या फिर पीस पार्टी तक सबकी अपनी-अपनी नजर बनी हुई है।
बस बीजेपी इस होड़ से पूरी तरह बाहर है. पार्टी ने न ही किसी मुस्लिम को अपना उम्मीदवार बनाया है और न ही मुस्लिम समुदाय के मतदाता इस चुनाव में बीजेपी के साथ खड़े दिख रहे हैं।
क्या मुस्लिमों को ये साथ पसंद है !
पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त मोदी लहर में सारी पार्टियों का सूपड़ा साफ हो गया था मुलायम सिंह यादव केवल अपना कुनबा बचाने में सफल हो पाए थे, लेकिन, बीएसपी का तो खाता तक नहीं खुल पाया था।
लेकिन, हकीकत में लोकसभा चुनाव के वक्त लगभग 20 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं जीत सका यही बात मुस्लिम समुदाय के लोगों को नागवार गुजर रही है।
अपने परिवार के झगड़े के बाद पार्टी के मुखिया बने अखिलेश को लगने लगा कि पांच साल के एंटीइंकंबेंसी के बाद अपने-आप को रेस में बनाए रखने के लिए हाथ का साथ जरूरी है अखिलेश ने राहुल का हाथ पकड़ा और राहुल ने साइकिल की हैंडल।
यह अखिलेश की मजबूरी ही थी जिसने कांग्रेस के साथ गठबंधन करने पर मजबूर कर दिया लेकिन, इस गठबंधन के जरिए मुस्लिम समुदाय के सामने एक बड़े विकल्प के रूप में अपने-आप को खड़ा करने में अखिलेश सफल रहे।
पश्चिमी यूपी से लेकर अवध क्षेत्र तक का दौरा करने के बाद लग रहा है कि अखिलेश की यह रणनीति उम्मीद के अनुरूप नहीं रही,मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद पर कंफ्यूजन है बलरामपुर क्षेत्र में अपना कारोबार करने वाले जाकिर हुसैन कहते हैं कि हम तो साइकिल को वोट करेंगे.
लेकिन गोंडा क्षेत्र में मोबाइल की दुकान चलाने वाले दिलशाद कहते हैं कि ‘हम तो हाथी को ही वोट करेंगे
कुछ यही हाल बस्ती का भी है बस्ती के रुधौली क्षेत्र के एक गांव में रहने वाली वहीदा खातून कहती हैं की हम तो मायावती को वोट देंगे
हालांकि अखिलेश ने समाजवादी पेंशन योजना शुरू की है इससे हमको फायदा हुआ है लेकिन मायावती के राज में गुंडागर्दी नहीं होती थी।
पार्टी के भीतर बेटे से लड़ाई हार चुके मुलायम सिंह यादव भी एक बार फिर से इस मुद्दे पर अपने पुराने रंग में दिखने लगे हैं समाजवादी मुलायम कह रहे हैं कि हमने मस्जिद बचाने के लिए गोलियां चलवाई थीं इससे साफ है किस तरह सपा मुस्लिम वोटरों के लिए हर हथकंडे अपना रही हैं।
माया का दांव कितना कारगर ?
इस बार के चुनाव में मुस्लिम वोटों की सबसे बड़ी सौदागर बनकर उभरी हैं मायावती। मैडम माया ने 403 में से 100 से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा कर सबसे बड़ा दांव चला है। मायावती हर मंच से सफाई भी दे रही हैं कि बीजेपी का साथ किसी भी सूरत में नहीं लेंगे वही मायावती को शाही इमाम बुखारी का समर्थन भी मिल गया है भले ही इस तरह के समर्थन का अब कोई मतलब नहीं रह गया हो लेकिन, सांकेतिक रूप से ही सही इसको भुनाने की कोशिश मायावती की तरफ से हो ही रही है। माया का दांव भी काफी हद तक कारगर साबित हो रहा है जहां-जहां बीएसपी के मुस्लिम उम्मीदवार हैं वहां मुस्लिम बीएसपी की तरफ भी जा रहे हैं।उन्हें लगता है कि इस बार दलित वोट बैंक के साथ अगर मुस्लिम वोट बैंक मिल जाए तो सीट बीएसपी के खाते में जा सकती है. मकसद तो बस बीजेपी को ही हराना है।बहराइच के भोपतपुर गांव के रहने वाले डॉ.बच्चन कहते हैं कि ‘बीएसपी के पास पहले से दलित वोट है, अगर इस बार मुस्लिम उम्मीदवार को मुस्लिम वोट मिल जाए तो उन जगहों पर बीएसपी की सीट निकल जाएगी। देखने में आ रहा है कि बीएसपी ने जिन जगहों पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए हैं, उन जगहों पर मुस्लिम बीएसपी के साथ खड़े दिख रहे हैं गोंडा जिले की 4 सीटों पर बीएसपी ने इस बार मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इन इलाकों में जाने के बाद ऐसा लग रहा है कि मुस्लिम इन सभी चारों सीटों पर बीएसपी के साथ जा रहे हैं लेकिन, उन्हें डर भी सता रहा है कि कहीं बीएसपी और एसपी के बीच वोटों का बंटवारा न हो जाए।
मुख़्तार इम्पैक्ट।
मुख्तार अंसारी के बीएसपी के साथ आने के बाद पूर्वांचल इलाके में मुस्लिम वोटरों का रुझान बीएसपी की तरफ बढ़ रहा है साफ लग रहा है कि इस बार मायावती के मुस्लिम कार्ड ने मुसलमानों के बीच सपा कॉग्रेस के लिए कन्फ्यूजन ज्यादा बढ़ा दिया है।
Nice
Thank you