लखनऊ /मुंबई/नई दिल्ली। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सामने एक बार फिर अस्तित्व का संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2022 में हुए बड़े राजनीतिक विभाजन के बाद अब पार्टी के लोकसभा सांसदों में भी बगावत खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों ने बगावती तेवर अपनाते हुए अलग समूह बनाने और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जानकारी के अनुसार, 18 जून को दिल्ली में आयोजित शिवसेना (UBT) की संसदीय दल की बैठक में पार्टी व्हिप जारी होने के बावजूद छह सांसद शामिल नहीं हुए। इसके बाद इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर लोकसभा में अलग संसदीय समूह की मान्यता देने तथा शिंदे गुट के साथ विलय की अनुमति देने की मांग की।
बागी सांसदों में मुंबई उत्तर-पूर्व से संजय दिना पाटिल, यवतमाल-वाशिम से संजय देशमुख, परभणी से संजय जाधव, शिर्डी से भाऊसाहेब वाकचौरे, हिंगोली से नागेश पाटिल अष्टीकर और उस्मानाबाद से ओमराजे निंबालकर शामिल हैं। इन सांसदों के विद्रोही तेवर ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व को बड़ा झटका दिया है। उधर, शिवसेना (UBT) नेतृत्व ने बगावत को गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने बागी सांसदों को “गद्दार” करार देते हुए सात दिन का कारण बताओ नोटिस जारी किया है। साथ ही उनके खिलाफ अयोग्यता (Disqualification) की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। राउत ने आरोप लगाया कि सांसदों को पार्टी छोड़ने के लिए 15 से 50 करोड़ रुपये तक के प्रस्ताव दिए गए। उन्होंने इसे “ऑपरेशन तोड़वा” की संज्ञा दी है।
ताज़ा राजनीतिक घटनाक्रम के बीच बागी सांसदों को वाई-प्लस सुरक्षा उपलब्ध कराए जाने की खबरों ने भी विवाद को और बढ़ा दिया है। इससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। आज शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस के अवसर पर दोनों गुट अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। शुरुआती अटकलें थीं कि स्थापना दिवस पर बागी सांसद औपचारिक रूप से शिंदे गुट में शामिल हो जाएंगे, लेकिन फिलहाल ऐसा कदम टाल दिया गया है। इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषक इसे शक्ति प्रदर्शन की लड़ाई के रूप में देख रहे हैं, जहां शिंदे गुट अपनी बढ़ती ताकत दिखाने की कोशिश करेगा, जबकि शिवसेना (UBT) अपने राजनीतिक अस्तित्व और संगठनात्मक आधार को बचाने की चुनौती से जूझता नजर आ रहा है। क्या शिवसेना का नाम ओ निशान दो हजार करोड़ में छीना गया? विस्तृत रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

Political विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम 2022 में हुए शिवसेना विभाजन की पुनरावृत्ति जैसा प्रतीत होता है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि शिवसेना (UBT) की अत्यधिक केंद्रीकृत नेतृत्व शैली क्या सांसदों और जनप्रतिनिधियों की नाराजगी का कारण बन रही है। दूसरी ओर, दल-बदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता पर भी नई बहस शुरू हो गई है। यदि यह संकट और गहराता है तो इसका असर केवल शिवसेना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति और 2027 के विधानसभा चुनावों की दिशा भी प्रभावित हो सकती है। For more updates follow on X
































