लखनऊ। “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” जैसे कालजयी शेर लिखने वाले मशहूर शायर और साहित्यकार बशीर बद्र (Bashir Badra) का निधन हो गया। उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने उनके इंतकाल की पुष्टि की है। बताया गया कि बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से जूझ रहे थे। पिछले कुछ समय से उनकी सेहत लगातार खराब चल रही थी और उन्हें लोगों को पहचानने में भी दिक्कत हो रही थी।
बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को आसान, आमफहम और बोलचाल की भाषा में नई पहचान दी उन्होंने अपनी अलग शैली से साहित्य जगत में विशेष स्थान बनाया। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों की नज़ाकत और आम जिंदगी के अनुभव बेहद खूबसूरती से दिखाई देते थे। यही वजह रही कि उनके शेर सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहे बल्कि आम लोगों की जुबान और सोशल मीडिया तक पहुंच गए।
शायर Bashir Badra के शेर आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं “अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है, मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे।” “सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा, इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा।” “ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं, पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।”
साल 1969 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वर्ष 1974 में मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए और 1990 तक अध्यापन कार्य किया। 1974 से 1990 के बीच का समय उनके रचनात्मक जीवन का स्वर्णिम दौर माना जाता है, जब उनकी शायरी ने देश और विदेश में व्यापक पहचान बनाई।
पंडित जवाहरलाल नेहरू पीजी कॉलेज (Pandit Jawaharlal Nehru PG College, Banda) के हिन्दी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जितेन्द्र बाजपेयी ने उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए News DON से कहा कि बशीर बद्र उर्दू शायरी की दुनिया में एक मजबूत सुतून की तरह थे। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र की शायरी में न भारी-भरकम अरबी-फारसी के शब्द थे और न ही किसी तरह की तंगदिली। उन्होंने हमेशा आम लोगों की भाषा में दिल की बातें कही, इसलिए उनके शेर प्रधानमंत्री से लेकर आम आदमी तक सभी की जुबान पर रहे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई मौकों पर मशहूर शायर बशीर बद्र के शेरों का उल्लेख किया था। संसद में विपक्ष को नसीहत देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बशीर बद्र का मशहूर शेर पढ़ा था, “दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”
डॉ बाजपेयी कहते हैं कि इस शेर के जरिये Prime Minister Narendra Modi ने लोकतंत्र में संवाद, मर्यादा और आपसी सम्मान बनाए रखने का संदेश दिया था। यही बशीर बद्र (Bashir Badra) की शायरी की सबसे बड़ी ताकत थी कि उनके अल्फाज़ राजनीति, समाज और आम जिंदगी हर जगह समान रूप से असर छोड़ते थे। उनकी शायरी में नफरत के बजाय रिश्तों को बचाने और इंसानियत को कायम रखने का पैगाम दिखाई देता था।
डॉ. बाजपेयी ने कहा कि किसी भी शायर के लिए यह सबसे बड़ी उपलब्धि होती है कि उसकी शायरी हर तबके तक पहुंचे। उन्होंने बशीर बद्र (Bashir Badra) को याद करते हुए कहा कि वह हिंदुस्तान की फिजाओं में हमेशा जिंदा रहेंगे। “हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। For updates follow on ✖️









































