कर्नाटक…चाहे कुछ भी हो अब ऐसे नहीं चलेगी कॉग्रेस

ये बात बहुत साफ है कि कांग्रेस को अब उस बहुजन वैचारिकी से भी कोई परहेज नहीं है, जिसने कांशीराम की अगुआई में पूरे देश में आकार लिया था। ये वैचारिकी बीजेपी की सांप्रादायिक राजनीति का एंटी डॉट है

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

लखनऊ (संपादकीय) । क्या देश बड़े सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की तरफ है और क्या इसकी पटकथा कर्नाटक से लिखी जा रही है? ये सवाल मन में इसलिए आया कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के सात मंत्रियों ने शपथ ली है  उनमें एक भी सवर्ण नहीं है लेकिन यह सबसे बड़ी खबर नहीं है। बड़ी खबर है ये है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अब एक नये रास्ते पर है और ये रास्ता सामाजिक न्याय का है।

कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से सवर्ण झुकाव वाली एक मध्यमार्गी पार्टी रही है जो सिद्धांत रूप में सामाजिक बदलाव का समर्थन करती है और इस दिशा में उसने थोड़े-बहुत काम भी किये हैं। लेकिन कांग्रेस की पूरी शैली यथास्थिति बनाये रखने की रही है। यानी आरक्षण के रास्ते थोड़े-बहुत एसटी-एसी और ओबीसी के लोगों का भला हो जाये लेकिन मूल रूप से सत्ता ब्राहणों के नेतृत्व वाले प्रभु वर्ग के पास रहे।

1989 भारतीय राजनीति का वो प्रस्थान बिंदु था जिसने सत्ता समीकरणों को स्थायी रूप से बदल दिया। ‘हिंदू गौरव’ के उभार के साथ सवर्णों ने कांग्रेस को बॉय बॉय कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ हो लिये। उधर कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन राजनीति का दौर शुरू हुआ तो दलितों का बहुत बड़ा तबका कांग्रेस से छिटक गया। ग़ौरतलब है कि पिछड़ी जातियां ऐतिहासिक रूप से कभी कांग्रेस के साथ नही रहीं लेकिन मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद वो यूपी-बिहार में और ज्यादा मजबूती से पिछड़े नेताओं के साथ खड़ी हो गईं, जिसका नेतृत्व उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव कर रहे थे।

हिन्दुत्व के उभार के उस दौर में रही-सही कसर बाबरी विध्वंस ने पूरी कर दी। मुसलमानों ने अपनी उम्मीद क्षेत्रीय छत्रपों में ढूंढी और कांग्रेस रातो-रात एक ऐसी पार्टी बन गई जिसके पास अपना कोई बड़ा कोर वोटर समूह नहीं था। इसके बावजूद गठबंधन के दौर में कांग्रेस सत्ता में लौटी लेकिन उसके अभिज्यात स्वभाव में कोई खास परिवर्तन नहीं आया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुसलमानों के पिछड़ेपन की हालत जानने के लिए सच्चर कमीशन का गठन किया और मानल संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण जैसे बड़े काम किये लेकिन कॉग्रेस ने कभी इनका ढोल नहीं पीटा।माना जाता है कि पार्टी के भीतर मौजूद सवर्ण दबदबे ने संभवत: उसे ऐसा नहीं करने दिया।

लेकिन 2023 में एक अनोखी बात हुई है। थोड़ा दायें, थोड़ा बायें करके सबको साधने की बरसों की नाकाम कोशिश के बाद कांग्रेस ने अब वो रास्ता पकड़ा जो उनके धुर विरोधी समाजवादियों का हुआ करता था। लोहिया के चिर-परिचित नारे “पिछड़ा पावे सौ में साठ“ की प्रतिध्वनि राहुल गांधी के उन भाषणों सुनाई पड़ती हैं, जब वो पूछते हैं कि उच्च पदों पर एसटी-एसी और ओबीसी के लोग क्यों नहीं हैं?

कांग्रेस जातिगत जनगणना की समर्थक थी लेकिन उसका स्टैंड कभी इतना मुखर नहीं था जितना अब है। ये कोई मामूली बदलाव नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने संसद में बहस के दौरान कहा हम भारत के मूल निवासी हैं आर्यों की तरह बाहर से नहीं आये हैं क्या आप इससे पहले इस बात की कल्पना कर सकते थे कि कांग्रेस का शीर्षस्थ नेतृत्व ऐसी भाषा बोल सकता है? कर्नाटक के चुनावी नतीजों के विश्लेषण से पता चलता है कि राज्य में बिखरी अलग-अलग ओबीसी जातियों ने कांग्रेस को भर-भरकर वोट दिये हैं। यानी हिस्सेदारी का जो सवाल कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उठा रहा है, उसका सीधा असर हो रहा है।

मंडल आंदोलन ने इस देश के भगवाकरण की प्रक्रिया को बहुत हद रोका था लेकिन आरएसएस की रणनीति और उसकी रात-दिन की कोशिशों ने ओबीसी के एक बड़े तबके को बीजेपी के साथ स्थायी रूप से जोड़ दिया। आज आप हिंदू राजनीति का जो सबसे आक्रमक और हिंसक चेहरा देखते हैं, वो बीजेपी के पिछड़े नेताओं का है। चित्तपावन ब्राहण तो सिर्फ मार्ग दिखाते हैं। क्या होगा अगर कांग्रेस जातिगत जनगणना, आरक्षण लागू करने में होनेवाली खामियो को दूर करने, रिजर्वेशन का दायरा बढ़ाने और सामाजिक संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे जैसे सवालों पर पूरी तरह आक्रमक हो जाएगी। इसका तात्कालिक राजनीतिक प्रभाव चाहे जितना भी लेकिन ये कहानी आगे बहुत दूर तक जाएगी।

कर्नाटक मंत्रीमंडल से बहुत साफ है कि कांग्रेस को अब उस बहुजन वैचारिकी से भी कोई परहेज नहीं है, जिसने कांशीराम की अगुआई में पूरे देश में आकार लिया था। ये वैचारिकी बीजेपी की सांप्रादायिक राजनीति का एंटी डॉट है। “श्रेष्ठ सनातन संस्कृति” के दावे प्रत्युतर“ सत्ता से विस्थापित मूल निवासी” के रूप में आने लगे तो बीजेपी की सामाजिक समीकरण दरकना शुरू हो जाएगा जो उसने पिछड़ी और दलित जातियों के मन में मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करके बनाई है। कॉग्रेस ने मुख्यमंत्री के रूप में डीके शिवकुमार की ताजपोशी कर दी है, विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें।

बीजेपी 24/7 वाली राजनीति करती है और आरएसएस हमेशा दस-बीस आगे सोचता है। बीजेपी के इको-सिस्टम में ओबीसी एक बड़ा भागीदार है। यूनिवर्सिटी में ओबीसी प्रोफेसर क्यों नहीं है, ये सवाल उन पिछड़ों को किस तरह आंदोलित कर सकती है, जो अपने किसी रिश्तेदार के पार्षद बन जाने को एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं? कांग्रेस के आइयोलॉजिकल शिफ्ट का 2024 के नतीजों पर कोई बड़ा असर पड़ेगा ये कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन ये दावे के साथ कहा जा सकता है कि कर्नाटक में प्रतिनिधित्व के सवाल पर जो तेवर राहुल गांधी ने दिखाये हैं, अगर वो उसपर कायम रहते हैं तो देश में एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का रास्ता तैयार होगा। For more updates follow on X 

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