लखनऊ (संपादकीय) । उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की अपर निजी सचिव UPPCS-APS परीक्षा-2023 में 331 रिक्तियों के बावजूद एक भी अभ्यर्थी का तृतीय चरण के लिए चयनित न होना केवल परीक्षार्थियों की असफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था और बदलती तकनीक के बीच बढ़ती दूरी का संकेतक भी है। यह घटना उस समय हुई है जब दुनिया तेजी से डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है। आज लोग मोबाइल पर बोलकर लिख रहे हैं, रोमन हिन्दी से सहज टाइपिंग कर रहे हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित तकनीकें लेखन कार्य को आसान बना रही हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या आज भी अपर निजी सचिव की योग्यता के लिये पारंपरिक हिन्दी आशुलेखन और हिन्दी टंकण की अनिवार्यता उतनी ही प्रासंगिक है जितनी दशकों पहले थी?
राज्य से लेकर केन्द्र तक, सरकारी कार्यालयों में कार्यशैली तेजी से बदल रही है। अब अधिकांश फाइलें डिजिटल हो चुकी हैं, नोटिंग ऑनलाइन होती है और वॉयस-टू-टेक्स्ट तकनीक आम होती जा रही है। ऐसे में UPPCS-APS जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा केवल पारंपरिक टाइपराइटर शैली की परीक्षा लेना युवाओं की वर्तमान कार्यकुशलता का सही मूल्यांकन नहीं माना जा सकता। यदि कोई अभ्यर्थी कम्प्यूटर, डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन और आधुनिक हिन्दी टाइपिंग में दक्ष है, तो उसे केवल इसलिए अयोग्य ठहराना उचित नहीं कि वह पुरानी शैली के आशुलेखन में कमजोर है।
हालांकि हिन्दी भाषा की शुद्धता और प्रशासनिक कार्यों में गति बनाए रखने के लिए टंकण कौशल आज भी महत्वपूर्ण है, लेकिन समय के साथ परीक्षा प्रणाली में बदलाव आवश्यक है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) को चाहिए कि वह UPPCS-APS की परीक्षा पारंपरिक हिन्दी आशुलेखन के साथ-साथ यूनिकोड टाइपिंग, वॉयस टाइपिंग, डिजिटल ऑफिस प्रबंधन और आधुनिक सॉफ्टवेयर दक्षता को भी परीक्षा का हिस्सा बनाए। तकनीक को अपनाना समय की मांग है। यदि व्यवस्था बदलाव के साथ नहीं चलेगी, तो प्रतिभाशाली युवा अवसरों से वंचित होते रहेंगे और रिक्तियां खाली रह जाएंगी।

































