लखनऊ (संपादकीय) । पश्चिम बंगाल की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहाँ केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विरासत के भविष्य का प्रश्न भी खड़ा हो गया है। 2026 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की करारी हार हुई, जहाँ पार्टी लगभग 80 सीटों पर सिमट गई और भाजपा 200 के पार पहुँच गई। TMC की हार ने उस संकट को उजागर कर दिया है, जिसकी आहट लंबे समय से सुनाई दे रही थी। अब पार्टी के भीतर बगावत खुलकर सामने आ चुकी है। विधानसभा में 58 से अधिक विधायकों ने रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने का दावा और लोकसभा में काकोली घोष के नेतृत्व में तकरीबन 20 सांसदों के एनडीए को समर्थन देने की घोषणा ने TMC की जड़ों में मट्ठा डाल दिया है इसे तृणमूल कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा आंतरिक संकट माना जा रहा है।

विडंबना यह है कि जिस पार्टी का जन्म 1998 में “घास की जड़ों” यानी Grassroots आंदोलन से हुआ था, आज वही पार्टी अपनी जड़ों से कटती दिखाई दे रही है। बागी नेताओं का आरोप है कि TMC में लोकतंत्र समाप्त हो चुका है और निर्णय प्रक्रिया एक परिवार तक सीमित हो गई है। असंतोष का सबसे बड़ा केंद्र अभिषेक बनर्जी की बढ़ती राजनीतिक शक्ति है। विद्रोही नेता रितब्रत बनर्जी ने कहा कि “Abhishek Banerjee is nobody in the 18th West Bengal state legislative assembly” ये अभिषेक बनर्जी पर सिर्फ व्यक्तिगत हमला नहीं है बल्कि संगठनात्मक असंतोष का प्रतीक बन चुका है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि TMC के अधिकांश विद्रोही अब भी ममता बनर्जी के प्रति सम्मान व्यक्त कर रहे हैं। कई बागी विधायक यह कह रहे हैं कि “ममता बनर्जी हमारी सर्वोच्च नेता हैं और रहेंगी।” इसका अर्थ साफ है कि यह लड़ाई ममता बनाम भाजपा नहीं, बल्कि तृणमूल के भीतर उत्तराधिकार और सत्ता संरचना की लड़ाई बन चुकी है। दूसरी ओर, महुआ मोइत्रा जैसे वफादार नेता बागियों को “ममता दीदी के करिश्मे पर राजनीति करने वाले अवसरवादी” बता रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि पार्टी अब दो ध्रुवों में बंट चुकी है।

इस संकट का असर केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। INDIA पॉलिटिकल ग्रुप पहले ही कई अंतर्विरोधों से जूझ रहा है। यदि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद वास्तव में एनडीए का समर्थन करते हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा की स्थिति और मजबूत हो सकती है। भाजपा नेताओं द्वारा “Shiv Sena 2.0” जैसी तुलना करना भी इसी राजनीतिक संदेश का हिस्सा है। महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन जिस तरह क्षेत्रीय राजनीति को बदल गया, उसी तरह बंगाल में भी नई राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना बन रही है।
हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम को केवल “भाजपा की जीत” या “तृणमूल की हार” के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में आंतरिक असहमति स्वाभाविक है। लेकिन जब असहमति संवाद के बजाय विद्रोह का रूप ले ले, तब वह संगठन की वैचारिक कमजोरी को उजागर करती है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर लंबे समय से भ्रष्टाचार, कटमनी संस्कृति, भर्ती घोटालों और परिवारवाद के आरोप लगते रहे हैं। चुनावी हार ने इन शिकायतों को विस्फोटक रूप दे दिया है। इसके बावजूद ममता बनर्जी की Politics हमेशा से संदेह के घेरे में रही है, उप राष्ट्रपति चुनाव के दौरान की रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।

सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक क्षमता और जनाधार के दम पर TMC को फिर से एकजुट कर पाएंगी? या फिर तृणमूल कांग्रेस भी भारतीय राजनीति की उन क्षेत्रीय पार्टियों की सूची में शामिल हो जाएगी, जो अपने ही उत्तराधिकार संकट में टूट गईं? बंगाल की राजनीति का भविष्य अब केवल विपक्ष और सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि नेतृत्व, लोकतंत्र और राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा बन चुका है। For more updates follow on X


































